असाध्य बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के मरणासन्न अवस्था में पहुंचने पर उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर रखे जाने से इंकार करने का अधिकार दिया जाना चाहिए या नहीं? चिकित्सा विज्ञान के साथ-साथ देश की अदालतें भी कई दशकों में इस नैतिक सवाल का जवाब ढूंढ पाई। अंतिम सांस तक जीवन की उम्मीद और ईश्वर के करिश्मे में असीम आस्था रखने वाले भारतीय इस तरह के रवैये को आत्महत्या के समान मानते हैं। लेकिन वहीं दूसरी तरफ असाध्य बीमारी के रोगी की पीड़ा भी असहनीय हो जाती है। इच्छामृत्यु पर अदालतों के विरोधाभासी निर्णयों से धुंध हटाने का काम सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने वर्ष 2018 में किया था। 13 साल से जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में इसे 2026 में अमल में लाया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बरसों तक अस्पताल में जीवन रक्षक उपकरणों और दवाओं के जरिए जिंदगी जी रहे मरीजों को अपनी पीड़ा को कम करने का मौका मिलेगा।
हरीश राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट का साहसिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 2018 में इच्छामृत्यु पर अपनी सैद्धांतिक मुहर लगा दी थी। 2023 में इसमें कुछ संशोधन भी किया गया लेकिन पहला केस जो सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, वह गाजियाबाद निवासी हरीश राणा का था। पंजाब विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग का छात्र हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गया था। चंडीगढ़ और दिल्ली के कई अस्पतालों में उसका इलाज चला। शरीर लकवाग्रस्त हो गया था। अस्पताल के साथ-साथ लम्बे समय तक घर पर भी जीवनरक्षक उपकरणों के जरिए उसे जिंदा रखा गया। माता-पिता, भाई-बहन के अथक प्रयासों के बावजूद भी जब स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो अदालत का रुख किया गया। माता-पिता की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) से मेडिकल बोर्ड गठित करने के लिए कहा। डाक्टरों ने साफतौर पर कहा कि हरीश की स्थिति में सुधार की गुंजाइश नहीं है। मेडिकल बोर्ड की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बिना देरी किए इच्छामृत्यु को स्वीकृति प्रदान कर दी।
अरुणा शानबाग मामले में हाई कोर्ट को दिए गए थे अधिकार
2011 में दिए गए निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने अचेतन अवस्था में पड़े मरीज से जीवन रक्षक सिस्टम को हटाने का अधिकार अदालतों को सौंप दिया था। सुप्रीम कोर्ट का मत था कि अस्पताल में लम्बे समय तक कृत्रिम श्वांस के जरिए जीवन काट रहे अचेतन मरीज से जीवन रक्षक उपकरणों को हटाया जाए या नहीं, यह सवाल उन तीमारदारों को उस समय बहुत कटोचता है जब उसके परिजन जिंदगी और मौत का फासला तय करने में लगे हों। सुप्रीम कोर्ट ने मरीज के सगे-संबंधियों की इस परेशानी को अदालत के कंधों पर डाल दिया। लेकिन पूरे एहतियात और शर्तों के साथ।
अरुणा शानबाग की दया मृत्यु की याचिका को शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया था लेकिन इच्छा-मृत्यु पर दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय मौत की इजाजत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इंजेक्शन के जरिए मौत की नींद सोने की इच्छा रखने वालों को सक्रिय दया मृत्यु(एक्टिस यूथेनेशिया) को सिरे से नकार दिया था। अदालत ने उस समय कहा था कि भारत में इस तरह की मौत चाहने वालों की इच्छा पूरी नहीं की जा सकती। लेकिन अस्पताल के बिस्तर पर लम्बे समय तक बेहोशी की हालत में पड़े मरीज को निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु(पैसिव यूथेनेशिया)की इजाजत कड़ी शर्तों के साथ दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भ्रष्ट हो चुके सिस्टम और चिकित्सा सेवा के व्यावसायीकरण की वजह से निष्क्रिय इच्छा मृत्यु का सवाल मरीज के रिश्तेदारों या डॉक्टरों पर नहीं छोड़ा जा सकता। गंभीर रूप से बीमार मरीज के परिजन प्रॉपर्टी हड़पने के लिए इच्छा मृत्यु की अनुमति का दुरुपयोग कर सकते हैं और पैसे की भूख में अपना कर्तव्य भूल चुके डॉक्टर इच्छा मृत्यु के नेक इरादों को मिट्ट में मिला सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे समाज में कमर्शलाइजेशन सभी सीमाएं लांघ चुका है। इसलिए निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति कदम फूंक फूंक कर देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश की हाई कोर्टों को ही पेसिव यूथेनशिया की इजाजत देने की अनुमति होगी। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस दो सदस्यीय खंडपीठ को इस तरह के मामले सौंपेंगे। खंडपीठ मरीज के परिजन को नोटिस जारी करेगी। डॉक्टरों के अलावा सभी पक्षों को सुनने के बाद ही निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अर्जी का निपटारा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट का मत था कि यह निर्णय संसद द्वारा इस विषय पर कानून बनाने तक लागू रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि सडक़ दुर्घटना आदि में गंभीर रूप से जख्मी शख्स कई बार इस हालत में नहीं होता कि वह अपनी जिंदगी के बारे में कुछ कह सके। ऐसे में उसके माता-पिता, पति या पत्नी, भाई-बहन या नजदीकी रिश्तेदार को जीवन रक्षक सिस्टम हटाने का निर्णय लेना पड़ता है। अगर मरीज के रिश्तेदार नहीं हैं तो उसके सर्वाधिक निकट व्यक्ति को इच्छा मृत्यु की अर्जी दायर करने का अधिकार होगा। इसके अलावा डॉक्टर भी अपनी राय दे सकेंगे। लेकिन जिंदगी और मौत का यह खेल इतना नाजुक है कि हम इसे इन सभी लोगों पर नहीं छोड़ सकते। नाते-रिश्तेदार और डॉक्टरों की सलाह पर आखिरी निर्णय हाई कोर्ट का ही होगा।
हाई कोर्ट भी तीन नामी डॉक्टरों का पैनल गठित करेगा। इसमें न्यूरोलोजिस्ट, फिजीशियन और साइकेटरिस्ट शामिल होंगे। राज्य सरकार की परामर्श से डॉक्टरों की फीस निर्धारित की जाएगी। इच्छा-मृत्यु की इस जटिल सवाल पर भी सुप्रीम कोर्ट ने देश में लगातार फैलते भ्रष्टïाचार पर कटाक्ष किया। अदालत ने कहा कि नेक इरादों से बनाए गए कानून या अदालत के आदेशों की इस भ्रष्ट सिस्टम में दुरुपयोग की हमेशा गुंजाइश रहती है। बेशर्म और निर्लज्ज लोग हमेशा निहित स्वार्थ के लिए कानून का दुरुपयोग करते हैं। भारत में नैतिकता का पतन हो रहा है। ऐसे में इच्छा मृत्यु के सवाल पर बेहद सजगता की जरूरत है।
सरकार से कानून लाने के लिए कहा सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च, 2026 को दिए निर्णय में केन्द्र सरकार से इस विषय पर कानून लाने के लिए कहा। अदालत का मत था कि इस संबंध में विधि आयोग की दो रिपोर्ट आ चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही केन्द्र सरकार से इस अहम मुद्दे पर कानून बनाने के लिए कहा था। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यह जीवन के अधिकार से संबंध रखता है। संविधान सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। इसमें गरिमा के साथ मौत भी निहित है।
