फर्जी मतदाताओं की तलाश में पात्र वोटर्स से अन्याय करता एसआईआर 

निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कई सवाल पैदा हो गए हैं। मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए निर्वाचन आयोग ने जो तरीका अपनाया है, वह कितना सही है, इसकी गहराई तक जाने की कोशिश नहीं की गई। बिहार तथा अन्य राज्यों में लाखों पात्र मतदाताओं को वोटर्स लिस्ट से हटा दिया गया। मतदाताओं ने अपील दायर करके अपना नाम बहाल करने का भरसक प्रयास किया लेकिन तब तक चुनाव की तारीख निकल चुकी थी और वह मतदान से वंचित रह गए। एसआईआर के दौरान देश के करोड़ों मतदाताओं को अपनी रिहायश और नागरिकता का सबूत देने के लिए जूझना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी मतदाताओं पर केन्द्रित निर्वाचन आयोग की कार्यशैली को हरी झंडी दे दी लेकिन उन मतदाताओं की ओर ध्यान नहीं दिया जो वैध नागरिक होने के बावजूद मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज नहीं करा सके। इनमें से अधिसंख्य समाज के वंचित वर्ग के लोग हैं। 

तार्किक विसंगति पर सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी से एसआईआर विवाद गहराया 

निर्वाचन आयोग का मतदाता सूची के ‘शुद्धिकरण’ का अभियान तीसरे चरण में पहुंच गया है। 16 राज्यों तथा तीन केन्द्र शासित प्रदेशों में विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) का काम जून 2026 में शुरू हो जाएगा। अभी तक 13 राज्यों में एसआईआर अंतिम मुकाम हासिल कर चुका है। एसआईआर की जटिल प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, विवाद गहराता जा रहा है। द्वितीय चरण में तार्किक विसंगति(लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी) के नाम पर पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख मतदाताओं को मतदान से वंचित कर दिया गया। 

 निर्वाचन आयोग ने बिहार के एसआईआर में तार्किक विसंगति(लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी) का क्लॉज नहीं जोड़ा था। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में इसे लाया गया और तार्किक विसंगति के कारण लाखों मतदाता मतदान से वंचित कर दिए गए। निर्वाचन आयोग ने वर्तनी की गलतियों(स्पेलिंग मिस्टेक्स)के आधार वैध मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए। इस पर खासा विवाद हुआ। दिलचस्प तथ्य यह है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज करने का अधिकार निर्वाचन आयोग का है। निर्वाचन आयोग के गैर-पेशेवर रवैये के कारण मतदाता सूची में वोटर्स के नाम सही नहीं दर्ज किए जाते। यह देखा गया है कि मतदाता जब अपना नाम दर्ज कराने के लिए फॉर्म-6 भरता है तो उसमें अपने नाम के साथ-साथ पिता का नाम, पति-पत्नी के नाम सही-सही दर्ज करता है। जन्म-तिथि तथा पता भी देखभाल के भरा जाता है। लेकिन मतदाता सूची और वोटर पहचान पत्र में यह विकृत कर दिया जाता है। आधुनिक प्रौद्योगिकी के बावजूद मतदाता पहचान-पत्र तथा मतदाता सूचियों में गड़बड़ बड़े पैमाने देखी जा सकती है। जब निर्वाचन आयोग का तंत्र ही सही-सही नाम दर्ज करने में असमर्थ हो तो मतदाता को उसके नाम की स्पेलिंग के लिए जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है। कहा जाए तो निर्वाचन आयोग अपनी ही अक्षमता का ठीकरा मतदाता पर फोड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में वर्तनी के गलतियों के कारण 27 लाख से अधिक मतदाता अप्रैल 2026 में हुए विधान सभा चुनाव में मतदान नहीं कर सके। उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया।

एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं के निपटारे में देरी

निर्वाचन आयोग ने जून 2025 के अंतिम सप्ताह में बिहार में एसआईआर का निर्णय लिया। एसोसिएशन फॉर डिमोक्रेटिक रिफाम्र्स(एडीआर) सहित कई गैर-सरकारी संगठनों ने एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिकाएं दायर  कर दी। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि एसआईआर की संरचना में बुनियादी खामियां हैं। एसआईआर में मतदाता को  ही अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कहा गया है। साथ ही तकरीबन 20 साल पहले बनी मतदाता सूची से उसका मिलान भी करना है। मतदाता सूची में पहले से दर्ज व्यक्तियों को गणना प्रपत्र(एन्यूमरेशन फॉर्म) भरने के लिए दिया गया तथा 20 साल पुरानी मतदाता सूची का विवरण दर्ज करने की जिम्मेदारी मतदाता पर ही डाल दी गई। साथ ही अलग-अलग श्रेणी के नागरिकों के लिए विभिन्न प्रकार के दस्तावेज संलग्न करने का निर्देश दिया गया। पासपोर्ट, हाईस्कूल प्रमाण-पत्र, जन्म प्रमाण-पत्र, जाति प्रमाण-पत्र आदि उपलब्ध कराने पर ही ड्राफ्ट मतदाता सूची में नाम सुनिश्चित हो सका। इससे साफ है कि अपने नागरिक होने का सबूत देने पर ही मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने की शर्त रखी गई। दस्तावेज के अभाव में मतदाता सूची में नाम दर्ज नहीं हो सके। समाज में हाशिए पर रह रहे लोगों के लिए कागजात को संभालकर रखना एक मुश्किल काम है और उन्हें ही यदि मतदान से वंचित किया जाएगा तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के बजाए कमजोर ही करेगा। 

निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2002 से 2005 के बीच भी इसी तरह का एसआईआर प्रभाव में लाया गया था। लेकिन उस समय किस तरह के दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, यह बताने में निर्वाचन आयोग सफल नहीं रहा। यह सर्वविदित कि लगभग 20 साल पहले वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने के लिए निर्वाचन आयोग का फॉर्म-6 पर्याप्त था। बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) किसी प्रमाणिक दस्तावेज हासिल करने पर जोर नहीं देते थे। 

 जुलाई 2025 से जनवरी 2026 तक इन याचिकाओं पर सुनवाई चली। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी, 2026 को सभी याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। लगभग 11 माह  बीत जाने के बाद 27 मई, 2026 को बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया।  

मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए न्यायाधीशों की सेवाएं ली गई

निर्वाचन आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया बेहद जटिल कर दी। पश्चिम बंगाल में 60 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम वोटर्स लिस्ट से हटा दिए गए तो सुप्रीम कोर्ट के जिला अदालतों में कार्यरत न्यायाधीशों को वोटर्स लिस्ट में सुधार के लिए लगाया गया। लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों ने दिन-रात काम किया। इनमें से लगभग 27 लाख मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लायक नहीं समझे गए। इन 27 लाख में से करीब 25 लाख मतदाताओं ने अपीलें दायर की। 20 अपीलीय न्यायाधिकरण गठित किए गए। हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की मदद ली गई। लेकिन जब तक अपीलीय पंचाट गठित हो पाते, चुनाव सिर पर आ गए। दो हजार से कम मतदाताओं को पंचाट से राहत मिली और आखिरी वक्त पर उनका नाम मतदाता सूची में शामिल किया गया। चुनावी प्रक्रिया समाप्त होने तथा नई सरकार के कार्यभार संभालने के बाद भी अपीलीय पंचाट मतदाता सूची के काम में जुटी हैं। 

नागरिकता जैसे संवेदनशील मसले पर गृह मंत्रालय से स्पष्ट जानकारी हासिल करनी चाहिए थी

 विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) पर दिए गए निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को नागरिकता का सत्यापन करने का सीमित अधिकार दे दिया है। लेकिन इस अहम मुद्दे पर केन्द्रीय गृह मंत्रालय से हलफनामा मांगा जाना चाहिए था। निर्वाचन आयोग को मिले सीमित अधिकार के कारण दस्तावेज के अभाव में हजारों नागरिक मताधिकार से वंचित रह जाएंगे। 

नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत केन्द्रीय गृह मंत्रालय को नागरिकता तय करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट को गृह मंत्रालय को निर्देश देना चाहिए था कि वह बताए कि नागरिकता साबित करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी हैं। उसके बाद ही निर्वाचन आयोग मतदाताओ के सत्यापन के का काम शुरू कर सकता है। चूंकि भारत की नागरिकता तय करने का अधिकार पूरी तरह केन्द्रीय गृह मंत्रालय के पास है। निर्वाचन आयोग को नागरिकता निर्धारित करने का हक नहीं है। 

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की मतदाता सूची से हटाए गए नामों को सक्षम अधिकारी के पास भेजने का निर्देश दिया है। सक्षम अधिकारी से कहा गया है कि लोक सभा या विधान चुनाव, जो भी पहले होने वाला हो, उससे पूर्व  नागरिकता के सभी मामले निपटाए। 

   इस जटिल प्रक्रिया से बचने के लिए गृह मंत्रालय से जवाब तलब करना चाहिए था। देश में हजारों-लाखों लोग हैं जिनके पास कागजात नहीं है। राशन कार्ड को सत्यापन के रूप में दस्तावेज मानने से निर्वाचन आयोग इंकार कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने भी उस पर मुहर लगा दी है। जिनका नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज है, यदि वह किसी कारणवश गणना प्रपत्र (एन्यूमरेशन फार्म) भरने या उसे जमा करने में नाकाम रहे तो बूथ लेवल अधिकारी(बीएलओ) को उनके निवास स्थान पर जाना चाहिए। बीएलओ को इस तरह के मतदाताओं के बारे में जानकारी हासिल करनी चाहिए थी। लेकिन कम समयावधि होने की वजह से बीएलओ भी ठीक तरह से काम नहीं कर पाए। 

समाज के निचले तबके के लोगों के पास सक्षम अधिकारी तक पहुंचने और अपना पक्ष रखने की हैसियत नहीं है। इसलिए वह अपनी नागरिकता कैसे साबित करेंगे। मतदाता सूची से एक बार नाम हटाने के बाद उसे बहाल करना बहुत मुश्किल है। तार्किक विसंगति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना मत व्यक्त नहीं किया है। बिहार के एसआईआर के समय यह समस्या सामने नहीं आई थी। पश्चिम बंगाल में 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने से यह इस पर चर्चा हुई। हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल से संबंधित याचिकाओं पर इसका उल्लेख करे। तार्किक विसंगति की जटिल समस्या से सुप्रीम कोर्ट भलीभांति अवगत है। पश्चिम बंगाल में 27 लाख मतदाताओं ने द्वितीय अपील दायर की। अपीलीय न्यायाधिकरण का समय पर गठन नहीं हो पाने के कारण बड़ी तादाद में लोग मतदान से वंचित रह गए। 

एसआईआर के बाद भी मतदाता सूची दुरुस्त हुई क्या

  बिहार सहित 13 प्रदेशों में एसआईआर का काम पूरा हो चुका है। क्या किसी ने यह जहमत की कि एसआईआर के बाद बनी मतदाता सूची का जायजा ले और बताए कि नई मतदाता सूची में कोई खामी नहीं है। बल्कि लगभग हर जगह पाया कि नई मतदाता सूची में वहीं खामियां हैं जो पहले थीं। यानी मतदाताओं के नाम की स्पेलिंग आदि में गलतियां बरकरार हैं। महिलाओं को एक अलग तरह की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कई मामलों में मतदाता सूची में पति की जगह पिता लिखा हुआ है और नाम पति का है। इसके ठीक विपरीत अविवाहित महिला के नाम के साथ उसके पिता की जगह पति लिख दिया गया है। नाम और पते में गड़बड़ी आम बात है। उत्तर-प्रदेश में बहुत कम मतदाता है जिनके पहचान पत्र और वोटर्स लिस्ट में एक भी गलती न हो। एसआईआर के दौरान बीएलओ तथा जिलों के वरिष्ठï निर्वाचन अधिकारियों से अनुरोध किया गया था कि प्रत्येक हाउसिंग सोसायटी तथा कॉलोनियों की मतदाता सूची मकानों की क्रमसंख्या के अनुसार तैयार करें ताकि मतदान के समय नाम ढूंढने में आसानी हो। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। निकटतम मतदान केन्द्र में भी नाम स्थानांतरित करने का अनुरोध भी ठुकरा दिया गया। इससे लगता है कि एसआईआर मतदाताओं की सहूलियत के लिए नहीं किया गया बल्कि इसका मकसद बड़ी तादाद में लोगों को मताधिकार से वंचित करना है। 

एसआईआर की समय-सीमा

एसआईआर के लिए जो समय सारिणी तय की गई,उस पर भी सवाल उठे। बिहार में सबसे पहले एसआईआर की प्रक्रिया को अंजाम दिया गया और इसके लिए चार माह से भी कम का समय दिया गया। पश्चिम बंगाल तथा तमिलनाडु में लगभग पांच माह का समय दिया गया। इस वृहद प्रक्रिया के लिए यह बहुत कम समय दिया गया। कई जगह बीएलओ घर-घर जाने में असमर्थ थे। उन्होंने अपने घर पर ही बैठकर प्रगणक पत्र भर लिए। एसआईआर से जुड़े कर्मचारियों का मानना है कि इस जटिल और वृहद प्रक्रिया को यदि सही मायनों में त्रुटिहीन और पारदर्शी बनाना है तो कम से कम एक साल का समय चाहिए। वैसे, मृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने, डुप्लीकेट नाम को दुरुस्त करने, मकान छोडक़र अन्यत्र चले गए लोगों के नाम हटाने का काम हर साल होने वाले सामान्य रिवीजन से हो जाता है। बीएलओ घर-घर जाकर और हाउसिंग सोसायटी तथा आरडब्लूए के पदाधिकारियों के सहयोग से यह काम सफलतापूर्वक करते रहे हैं। इसके लिए एसआईआर कारगर हथियार नहीं है। मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को सरकारी योजनाओं से भी वंचित किया जा रहा है। उनकी नागरिकता तय किए बिना सरकारी योजनाओं से वंचित करना उचित नहीं है।

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Vivek Varshney

Vivek Varshney is Accredited Legal Correspondent of Supreme Court of India. He has been on- ground journalist, covering courts, for the last 35 years. He initiated his career as a city reporter with leading Hindi daily Jansatta in 1992.Holding degrees in Journalism and Law, Vivek has covered trial court’s of Delhi, High Court and Supreme Court of India, writing on court proceedings, landmark judgments, legislative changes and  administration of justice..At Jansatta, Navbharat Times and  Rashtriya Sahara, Vivek has tried to make news related to different courts, accessible to the readers in a way that makes it easy to understand.Vivek has 35+ years of experience in journalism. He is an alumni of Aligarh Muslim University (AMU).

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