बिहार के वोटर्स के सिर पर मंडराता एसआईआर का खतरा

बिहार विधान सभा के इस साल के अंत में होने वाले चुनाव से लगभग चार माह पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) के निर्वाचन आयोग के आदेश ने लोकतंत्र के प्रहरियों को हैरत में डाल दिया। मतदाता सूची में अपना नाम शामिल करने की एसआईआर की शर्तों ने बिहार के साथ-साथ देश की बहुत बड़ी आबादी को और अधिक चौंकाया। निर्वाचन आयोग ने पहली बार मतदाताओं से नागरिकता के सबूत मांगे। 11 दस्तावेज की सूची में कोई एक प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। आधार, राशन कार्ड और निर्वाचन आयोग द्वारा पूर्व में जारी मतदाता पहचान पत्र (एपिक कार्ड) को मतदाता सूची में नाम शामिल करने की फेहरिस्त से बाहर रखा गया। 

निर्वाचन आयोग की एक महीने की कवायद ने बिहार के लगभग 65 लाख मतदाताओं को वोटर्स लिस्ट से बाहर कर दिया। चुनाव आयोग का कहना था कि बिहार की सात करोड़ 89 लाख मतदाताओं में से 22 लाख की मृत्यु हो गई, 36 लाख वोटर्स या तो पलायन कर गए या उपलब्ध नहीं है और सात लाख लोगों का कई जगह मतदाता सूची में नाम दर्ज है।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

तीन दिन की लम्बी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त को निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए मसौदा मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख मतदाताओं का विवरण प्रकाशित करे और साथ ही उन्हें शामिल न करने के कारण भी बताए। 

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की दो सदस्यीय बेंच ने बिहार में मतदाता सूची की एसआईआर कराने के 24 जून के निर्वाचन आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में थे, लेकिन मसौदा सूची से हटा दिए गए। मसौदा सूची को एक अगस्त, 2025  को प्रकाशित किया गया था। जिन लोगों की मृत्यु हो गई है, जो पलायन कर गए हैं या अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में चले गए हैं, उनके नामों की सूची पंचायत स्तर के कार्यालय और जिला स्तर के निर्वाचन अधिकारियों के कार्यालय में कारणों सहित प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने टेलीविजन समाचार चैनलों और रेडियो के अलावा स्थानीय भाषाओं एवं अंग्रेजी दैनिकों समेत समाचार पत्रों के माध्यम से व्यापक प्रचार करने पर जोर दिया, ताकि लोगों को उन स्थानों के बारे में जानकारी दी जा सके जहां सूची उपलब्ध होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि नाम हटाए जाने से जिन लोगों को दिक्कत है, उन्हें अपने आधार कार्ड के साथ निर्वाचन अधिकारियों से संपर्क करने की अनुमति दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से 22 अगस्त तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी है।

एपिक नंबर के जरिए मतदाता सूची में नाम चेक करने का विकल्प दिया जाए वोटर्स को

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम 2025 की मतदाता सूची में थे लेकिन अब वह नदारद हैं, उनके नाम जिलेवार प्रकाशित किए जाएं। जिला निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर भी इसे दिखाया जाए ताकि मतदाता एपिक नंबर डालकर पता लगा सकें कि उनका नाम किस वजह से हटाया गया है। इलैक्ट्रोनिक माध्यम के अलावा बीएलओ, बीडीओ तथा पंचायत दफ्तर पर भौतिक सूची में उपलब्ध कराई जाए। निर्वाचन आयोग सार्वजनिक नोटिस में स्पष्ट रूप से बताए कि पीडि़त व्यक्ति 11 दस्तावेज के अलावा आधार कार्ड को भी सबूत के तौर पर पेश करके मतदाता होने का दावा पेश कर सकता है। वेबसाइट मतदाता पहचान पत्र संख्या (एपिक नंबर) से सर्च करने लायक बनाई जाए।    

निर्वाचन आयोग ने बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर महीने भर चली एसआईआर प्रक्रिया पूरी करने के बाद राज्य के लिए मतदाता सूचियों का मसौदा एक अगस्त को प्रकाशित किया था।

क्या 2003 में वाकई इस तरह की गहन प्रक्रिया अपनाई गई थी? 

सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से उन दस्तावेज की जानकारी देने को कहा, जिन पर बिहार में 2003 के गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान विचार किया गया था।  अदालत ने कहा कि हम चाहते हैं कि निर्वाचन आयोग बताए कि 2003 की प्रक्रिया में कौन से दस्तावेज लिए गए थे। अदालत की यह टिप्पणी तब आई जब एक पक्षकार ने कहा कि अगर एक जनवरी, 2003 (पहले की एसआईआर की तिथि) की तारीख हटती है, तो सब कुछ खत्म हो जाएगा है। यह बताने के लिए कुछ भी नहीं था कि यह तारीख क्यों है। यह धारणा बनाने की कोशिश की जा रही है कि यह वही तारीख है जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए गहन प्रक्रिया हुई थी। यह कहा गया है कि उस समय जारी किया गया ईपीआईसी (मतदाता) कार्ड समय-समय पर की गई संक्षिप्त कवायदों के दौरान जारी किए गए ईपीआईसी (मतदाता) कार्ड से ज्यादा विश्वसनीय है, जो गलत है। वकील ने पूछा कि अगर गहन और संक्षिप्त संशोधन के तहत नामांकन की प्रक्रिया एक ही है, तो संक्षिप्त प्रक्रिया के तहत जारी किए गए ईपीआईसी कार्ड कैसे रद्द किए जा सकते हैं। इसलिए 2003 की तारीख अमान्य है। उन्होंने कहा कि मेरे गणना फॉर्म की कोई रसीद या प्राप्ति की पुष्टि करने वाला कोई दस्तावेज नहीं दिया जा रहा है और इसलिए बूथ स्तर के अधिकारियों का दबदबा है और इन निचले स्तर के अधिकारियों के पास फॉर्म लेने या न लेने का बहुत ज़्यादा विवेकाधिकार है।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के नेताओं और गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) ने बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण की कवायद को चुनौती दी है।

मतदाता को जोडऩे की प्रक्रिया नदारद 

दरअसल, मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने लिए बेहद सामान्य प्रक्रिया अपनाई जाती रही है। निर्वाचन आयोग के फार्म-6 को भरकर 18 वर्ष से अधिक का कोई भी व्यक्ति अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज करा सकता है। पिछले 10-12 साल में निवास के प्रमाण के तौर पर आधार कार्ड का चलन ज्यादा हो गया। वैसे भी, भारत में नागरिकता का सबूत जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट है। बिहार में यह दोनों दस्तावेज बहुत कम लोगों के पास हैं। रिवीजन के नाम पर लोगों का वोटर्स लिस्ट से नाम हटाने की कवायद पहली बार की जा रही है। मतदाता सूची में हर साल रिवीजन होता है। बूथ लेवल अफसर(बीएलओ) हर घर जाकर 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके युवाओं का नाम मतदाता सूची में दर्ज करते हैं। कुछ दिन बाद नए वोटर को मतदाता पहचान पत्र जारी कर दिया जाता है। मतदाता पहचान पत्र विधान सभा तथा लोक सभा के चुनाव में वोट डालने के काम तो आता ही है, रोजमर्रा की जरूरतों में यह निवास के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल होता है। मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की एक बड़ी वजह पहचान पत्र हासिल करना भी होता है ताकि अधिवास प्रमाण पत्र के रूप में इसका प्रयोग किया जा सके। लेकिन बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण में सिर्फ मतदाताओं को हटाने की बात हो रही है, उन्हें जोडऩे की नहीं। यह बात जरूर आश्चर्यजनक लगती है। 

सुप्रीम कोर्ट ने लाल बाबू हुसैन बनाम मतदाता पंजीकरण अधिकारी के मामले में साफतौर पर कहा है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए किसी को भी नागरिकता साबित करने की जरूरत नहीं है। 1995 में दिए गए फैसले में कहा गया है कि यदि निर्वाचन आयोग के पास किसी वोटर के खिलाफ ठोस सबूत हैं तो पंजीकरण अधिकारी उसकी जांच कर सकता है। मतदाता सूची से हटाए गए नामों का विस्तृत विवरण मांगकर और उन्हें वेबसाइट पर डालने का आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के दावे की सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की है।


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Vivek Varshney

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